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बॉलीवुड में लंबे समय से एक के बाद एक मसाला और एक्शन फिल्मों का दौर देखने को मिला है। ऐसे समय में जब दर्शक हल्के-फुल्के रोमांस या इमोशनल ड्रामा की तलाश में रहते हैं, उसी खाली जगह को भरने के मकसद से Param Sundari को बड़े परदे पर लाया गया। तुषार जलोट के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और जाह्नवी कपूर लीड रोल में हैं।

फिल्म का सेटअप पूरी तरह से केरल की खूबसूरत वादियों में रचा गया है और शुरुआत से ही यह साफ हो जाता है कि निर्देशक ने विज़ुअल अपील पर खास ज़ोर दिया है। सवाल यह है कि क्या शानदार लोकेशन और अच्छे गानों से आगे यह फिल्म कुछ ठोस पेश कर पाती है या नहीं।

फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है इसकी सिनेमैटोग्राफी। हर फ्रेम में केरल की हरियाली, बैकवॉटर और प्राकृतिक सुंदरता को इतनी खूबसूरती से कैद किया गया है कि यह फिल्म कई बार टूरिज़्म ऐड जैसी लगती है। कैमरे के पीछे संतोष कृष्णन रवि चंद्रन ने बेहतरीन काम किया है और दर्शकों को विज़ुअल ट्रीट दी है। संगीत भी फिल्म का मजबूत पहलू है। सचिन–जिगर का म्यूज़िक और सोनू निगम की आवाज़ में पर्देसिया तुरंत दिल को छू लेता है। वहीं, चाँद कागज़ का गाना गहरी भावनाओं से भरा है और फिल्म का सबसे soulful ट्रैक बनकर उभरता है। गानों के मामले में फिल्म उम्मीदों पर खरी उतरती है और यही इसकी असली ताक़त है।

लेकिन जहां तक कहानी और परफॉर्मेंस का सवाल है, वहीं पर फिल्म ढीली पड़ जाती है। कहानी साधारण और बार-बार दोहराई हुई लगती है। अमीर घर का बिगड़ैल लड़का Param (सिद्धार्थ मल्होत्रा) स्टार्टअप्स में पैसा डुबोने के बाद केरल पहुँचता है और वहां ठहरता है एक स्थानीय होमस्टे में, जिसे चलाती है Sundari (जाह्नवी कपूर)। शुरुआती टकराव और फिर धीरे-धीरे पनपता रोमांस ही कहानी की धुरी है। लेकिन यह सब इतने क्लिशे तरीके से दिखाया गया है कि न कोई नया मोड़ मिलता है और न ही कोई भावनात्मक गहराई।

अभिनय के मामले में भी फिल्म कमजोर साबित होती है। सिद्धार्थ मल्होत्रा स्क्रीन पर अच्छे दिखते हैं, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस एक ही लेयर में फंसी हुई लगती है। रोमांटिक और इमोशनल सीन में वह दर्शकों को जोड़ने में नाकाम रहते हैं। जाह्नवी कपूर अपनी खूबसूरती और स्क्रीन प्रेज़ेंस से तो प्रभावित करती हैं, लेकिन संवाद अदायगी और एक्सेंट के कारण उनका अभिनय असरदार नहीं बन पाता। दोनों के बीच की कैमिस्ट्री गानों में तो काम करती है, पर जब बात असली भावनाओं की आती है, तब वह बिल्कुल खोखली लगती है।

फिल्म के किरदार भी गहराई से लिखे नहीं गए। केरल को दिखाने के नाम पर कई रूढ़िबद्ध छवियाँ पेश की गई हैं—ड्रंकल अंकल, ओवर-द-टॉप लोकल्स और स्टीरियोटाइप्ड सिचुएशन्स। इस वजह से फिल्म का भावनात्मक पक्ष और भी कमजोर हो जाता है। रोमांस सतही लगता है, हास्य मजबूरन डाला गया प्रतीत होता है और कई सीक्वेंसेज़ सिर्फ गाने या विज़ुअल मोंटाज की तरह महसूस होते हैं।

कुल मिलाकर, Param Sundari खूबसूरत विज़ुअल्स और शानदार संगीत की वजह से आकर्षक लगती है। दर्शक केरल की प्राकृतिक सुंदरता और बेहतरीन गानों का आनंद ज़रूर उठाते हैं, लेकिन जब बात कहानी, अभिनय और इमोशन की आती है तो फिल्म पूरी तरह असफल रहती है। यह फिल्म आंखों और कानों के लिए तो एक ट्रीट है, लेकिन दिल को छूने के मामले में पूरी तरह खाली साबित होती है।

रेटिंग: 2/5

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